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Yar jadugar nilotpal mrinal

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  पैसा में पृथ्वी से जादा गुरुत्वाकर्षण और अप्सरा से जादा आकर्षण होता है। आदमी उस गुरुत्वाकर्षण से कहीं भी खींचा चला जा सकता है, जो आपको न्यूटन के सेब से लाख गुना ज्यादा नीचे गिरा सक्ता है। लालच के पेड़ से टपका आदमी जमीन पर नहीं पाताल में गिरता है । #निल्ल_मेहरा  #यार_जादुगर @नीलोत्पाल 

छठ आपको घर नहीं गावँ बुलाता है

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  नमस्कार प्रणाम जोहार, आप सभी को छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं,, छठ मईया हम सब पर शहाय हो, छठी मईया पुरे दुनिया पर कृपा वर्षाये। आपने पुछा है, छठ की ओ पाँच खास बातें जो हम सब को अपनी और खिंचती हैं प्रभावित करती है, इस पृथक संस्क्रति समाज वाले प्रयद्वीप में तमाम  प्रकार के त्योहार है, दीपावली दसेहरा होली इन सब मौके पर आप घर आते हैं,  लेकिन बता दूँ की छठ पर्व हीं एक ऐसा महांपर्व है जिसमें आप अपना घर नही अपना गावँ आते हैं,  छठ घर नहीं बुलाता है छठ गावँ बुलाता है। बोलिये गा कैसे तब, छठ तभी होता है जब आपको पता चले की बगल वाले मास्टर साहब का सुप आपके यहाँ आया है, जब आपको पता चले की फलनवाँ दुकान वाले भईया जो हैं ऊ सुप और डाला आपके यहाँ ला के दे दियें हैं, काई बार येसा होता है कि हमारा सुप उनके यहाँ गया है , तो छठ एसे होता है। छठ एसे होता है, कि झुनकी माई आयेगी आंटा सानेगी ठेकुवा बन रहा है तो फिर फलनावाँ माई आयेगी , बडकी काकी आयेगी मोहल्ला वाली हऊ चाची आयेगी, हई बुवा आयेगी, बिना, बुवा, चाची, फलनवाँ माई, फलनवाँ काकी के बिना छठ नहीं हो सकता है, छठ में इन सब का आना छठ म...

Jai Bhim movie review

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फिल्म: जय भीम निर्देशक: टी. जे. ज्ञानवेल कास्ट: सूर्या, प्रकाश राज, राव रमेश, रजीशा विजयन, मणिकंदन और लीजोमोल जोस प्रसारण : अमेजन प्राइम वीडियो                                          क्या है कहानी 'जय भीम' इरुलुर आदिवासी समुदाय के एक जोड़े सेंगगेनी और राजकन्नू की कहानी है। राजकन्नू को झूठे आरोप में पुलिस गिरफ्तार कर लेती है और इसके बाद वह पुलिस हिरासत से लापता हो जाता है। ऐसे में उसकी पत्नी उसकी तलाश के लिए वकील चंद्रू (सूर्या द्वारा निभाया गया किरदार) का सहारा लेती है। बता दें कि यह फिल्म 90 के दशक में तमिलनाडु में हुई सच्ची घटनाओं पर आधारित है। जय भीम' अपने पहले ही सीन से दर्शकों का ध्यान खींचने में कामयाब होती है। पहले सीन में दिखता है कि कुछ लोग लोकल जेल से बाहर निकले हैं और उनका परिवार बाहर इंतजार कर रहा है। बाहर निकल रहे लोगों को उनकी कास्ट पूछकर रोका जाता है और जो निचली कास्ट के होते हैं, उन्हें फिर से किसी पुराने केस में आरोपी बनाकर पुलिस को सौंप दिया जाता है।  ...

लेखअंश 2020

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   लेखअंश 2020   एक बार फिर से,,,, विज्ञान संकाय का एक नवसिखीया माटी जब अपने गांवं देहात कस्बा के स्कूल से मेट्रिक पास कर, किसी शहर या महानगरों के 10×10 कमरा के भट्टी में तप कर गावँ की माटी को सोना मे कैसे बदल देती है, हमारे कलम के निभ द्वारा छोड़ गया सबूत। Click Here and read - Student life

छठ घाट, तुम और हम

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  सुनों...  हम और तुम छठ करेंगे पूरे परिवार के साथ मिलकर, एक साथ उपवास रहेंगे। यही 'गिरिडीह' के एक सुदूर देहात के पोखरे में घंटों खड़े होकर इस कार्तिक महिने के जड़ाह भोरहरी में रूठे आदित्य को थरथराते हुए मनाएंगे हम एक-दूसरे को दयाभाव से देखते रह जाएंगे। ऐसे में कभी-कभी तो परिवार वालों के लिहाज़ से एक-दूसरे को देख भी नहीं पाएंगे, तब हम पोखरे के पानी में प्रतिबिंबित तुम्हारा मनन्त माँगता हुवा चेहरा देखने का प्रयत्न करते हुए पकड़े जाएंगे।। तुम्हारी 'मुस्कराहट' तब देखते बनेगी.......❤ - निल्ल मेहरा 

यही दशहरा है।

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       यही दशहरा है, जिसमें दीपकवा बाऊजी से पईसा मांगता है दशहरा मेला घुमने के लिए, बाऊजी इशारा करते हैं खुंटी पे टंगे कुरता के तरफ और दीपक तीन सौ रुपया पा के कहता है "सब ले लें".. बाऊजी मुस्का के कहते हैं "अरे ले ल, सब तोहरे त ह, तु ही त हव"...  अलग बात है ये थोड़ा-सा फिल्मी बात लग रहा होगा कि कवनो गाँव के दीपकवा को उसके बाऊजी तीन सौ रुपया कैसे इतना आसानी से दे दिए होंगे... पर चलिए मैनेज किजीए हर बाप एक जैसा नहीं होता है महराज आदमी-आदमी पे निर्भर करता है, पर ऐसा मत समझिये हुजूर हर बाप का एक मजबूरी होता है, हो सकता हो 300 रुपये में ही उसे सबको मेला दिखाना हो जो कि आज संभव नहीं है, पर कभी था तो मैं तभी की बात कर रहा हूँ या हो सकता है अभी भी कहीं गाँव देहात में ऐसा हो!! भैया सब के जमाने में तो 300 में बहुत था.. तब हम पहली बार जिद्द कर के घर से 100 रुपया लिए थे और कुछ दस टकिया नोट भी जिसके गर्मी से कॉलर उठा के गए थे मेला देखने वही छोटका, रजुआ, मुकेशवा के साथ ।। तब 3 रुपया में दो सिंघाडा मिलता था, 6 रुपया में फुल प्लेट चार्ट, जलेबी 7 रुपये पउवा था।। रास्ता में कोई ह...

बाईक है मेरी लेके आऊंगा

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छोटे शहरों में कॉलेज जाने वाली लड़कियाँ भी कितना ख्याल रखती हैं सबका...और इस क्रम में उनके आईने के सामने खड़े होने के वक्त में इजाफ़ा होने लगता है, बिंदी किसी के पसंद की लगानी होती है, दुपट्टा माँ के हिसाब से जो अंग को भरपूर ढक ले, लिपस्टिक थोड़ा हल्का कि मोहल्ले की आंटियां तंज ना कसें, कपड़े बाउजी के मन का ताकि समाज में उनका इज़्ज़त बरकरार रहे.......... और छोटे शहर के लड़के अक्सर लेट आते हैं मिलने उस ओढ़नी से चेहरा बांधे खड़ी लड़की से जहाँ इंतज़ार कर रही वो बहुत घबराई हुई बार-बार घड़ी देखती है और एक डर जो हमेशा सताता है "कोई देख ना ले"..... सोचता  हूँ   कि  बंद  कमरे  में , एक शमआ-सी जल रही होगी । शहर की  भीड़-भाड़  से   बचकर , तू   गली   से  निकल  रही  होगी  । - दुष्यन्त कुमार लड़के को लेट इसलिए होता है कि वो हिरो बनना चाहता है कहानी का, बड़बोलेपन में कहता है "बाईक है मेरी लेके आऊंगा".. बाईक के जुगाड़ में वो पुरा शहर छान देता है, अंत में किसी दोस्त के फुफा के चचरे भाई के साले की बाईक ...