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तुम श्रावण वाली बारिश बनना,जब मैं, ग्रीष्म काल सी खेत बनू।

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तुम श्रावण वाली बारिश बनना, जब मैं, ग्रीष्म काल सी खेत बनू। रिम-झिम राग सुना जाना तुम, तब मैं, उड़न पंजाब सी खेत बनू। तुम गंगा वाली दरिया सा बन, जब मैं, सुखी नदियों सा रेत बनू। कल-कल संग बहा जाना तुम, तब मैं,आखरी मंजिल तक साथ बहुँ।  तुम बन जाना बूँद बादलों में रहनें वाली सी, जब मैं,कचे मकानों की चुवने वली सी छत बनू । गड़-गड़ धुन धुन सुना जाना तुम, तब मैं,सदियों नील गगन में तुझे देख सकूँ। तुम श्रावण वाली बारिश बनना, जब मैं, गृषम काल सी खेत बनू। रिम-झिम राग सुना जाना तुम, तब मैं, उड़न पंजाब सी खेत बनू। -निल्ल मेहरा