गांव का प्यार / Village love
गांव की वो गोरी..
बहुत याद आती है..!
मगर कभी खुशी..
कभी आंसू दे जाती है..!!
दरवाजे की ओट से..
वह हमें देखती थी..!
ओझल न हो जाए..
तब तक निरेखती थी..!!
देखते थे हम भी..
जब बगीचे में आती थी..!
नजरें बचाकर सबकी..
हमें देख मुस्कुराती थी..!!
लगता था हमें जैसा..
वो सब बहाना था..!
महुआ बिनने के बहाने..
हमें देखने आना था..!!
चाहत हमारे दिल में भी थी..
मगर कहने से डरते थे..!
कहीं बदनाम ना हो जाए वो..
हम सहमे सहमे रहते थे..!!
इशारों इशारों में ही..
बहुत सी बातें होती थी..!
गांव का प्यार था साहब..
सो सपनों में मुलाकाते होती थी..!!
वक्त ने करवट ली..
हम कमाने को परदेस गए..!
वापस आए तो विदाई थी उसकी..
झर ~ झर आंखों से नीर बहे...!!
~ रोशन बाबू✍️❣️

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