यही दशहरा है।

       यही दशहरा है,

जिसमें दीपकवा बाऊजी से पईसा मांगता है दशहरा मेला घुमने के लिए, बाऊजी इशारा करते हैं खुंटी पे टंगे कुरता के तरफ और दीपक तीन सौ रुपया पा के कहता है "सब ले लें".. बाऊजी मुस्का के कहते हैं "अरे ले ल, सब तोहरे त ह, तु ही त हव"... 

अलग बात है ये थोड़ा-सा फिल्मी बात लग रहा होगा कि कवनो गाँव के दीपकवा को उसके बाऊजी तीन सौ रुपया कैसे इतना आसानी से दे दिए होंगे... पर चलिए मैनेज किजीए हर बाप एक जैसा नहीं होता है महराज आदमी-आदमी पे निर्भर करता है, पर ऐसा मत समझिये हुजूर हर बाप का एक मजबूरी होता है, हो सकता हो 300 रुपये में ही उसे सबको मेला दिखाना हो जो कि आज संभव नहीं है, पर कभी था तो मैं तभी की बात कर रहा हूँ या हो सकता है अभी भी कहीं गाँव देहात में ऐसा हो!!

भैया सब के जमाने में तो 300 में बहुत था.. तब हम पहली बार जिद्द कर के घर से 100 रुपया लिए थे और कुछ दस टकिया नोट भी जिसके गर्मी से कॉलर उठा के गए थे मेला देखने वही छोटका, रजुआ, मुकेशवा के साथ ।। तब 3 रुपया में दो सिंघाडा मिलता था, 6 रुपया में फुल प्लेट चार्ट, जलेबी 7 रुपये पउवा था।। रास्ता में कोई हंसते हुए पुछ देता कि "केतना माल-पानी मिलल बा बचवा" तो हम गदगद हो के उ हरियरका गांधी छाप दिखा के फुले नहीं समाते थे.. तो उ कहता कि "मरदे तु ही जिलेबी महंगा करवईबा, तोहरा कवन काम बा ओतना पईसा के"... मतलब ये वैल्यू था सौ रुपया का।। 


खैर, दीपक 300 ले लिया है बाऊजी से, जवान है ,कालेज में पढ़ता है, चार-पांच दोस्त हैं, पहली बार सिगरेट को हाथ लगाता है हां एकदम वैसे जैसे सब पहली बार हाथ लगाते हैं पर पता नहीं कब होंठ लग जाता है!! और सिगरेट पीते हुए वो देख लेती है जिसे वो दिखाना चाहता था, इधर वो खांसता है जिससे वो नवसिखिया साबित होता है उधर वो ये सब देख के मुस्काती है।। 

वो भी अपने चार सहेलियों के साथ है, नाम क्या है वो दीपकवा जानता है हमको नहीं पता कुछ, पर उजर सुट सलवार पे वो करिया ओढ़नी ऐसे सजाई थी जैसे उन सब सहेलियों ने आपस में तय किया हो "ओढ़नी करिया ओढ़ के आना,ए सखी सुनो अबकी मेला में" !! 

गुब्बारा खरीदने के खातिर रुकती है, गुब्बारा तो बहाना था मैडम को तो दीपकवा का राह तकना था, उधर दीपक भी गुब्बारा खरीदता है और हवा में उड़ा देता है।। गुब्बारा "करिया ओढ़नी" वाली के ऊपर-ऊपर उड़ रहा होता है, उसे देख के दीपक बहुत खुश होता है और उधर वो लड़की भी जिसके चलते ये दशहरा का चुनाव दीपकवा भारी भारी मतों से विजयी होता है।। 

दोनों एक दुसरे को देखते हैं, दीपका लजाते हुए फोन नंबर एक पुर्जी पे लिख के देता है और वो पुर्जी ले के जल्दी से अपने पर्स में रख लेती है।। 

उधर जितेन्द्र जीऊवा भी चईत में बियाह कर के पछता रहा है। वो पास के ही गाँव के एक लभली कुमारी से बियाहे गए थे पर गवना नहीं हुआ था तो उनको भी इस दशहरा का बेसब्री से इंतजार था।। काहें कि लभली कुमारी अइसे कहीं बाहर नहीं जाती, पर दशहरा मेला घुमने हर साल सहेलियों के साथ निकलती थी.. जहर जैसा धुप में वो मखमली त्वचा वाली लभली जब मेला में कहीं चाट खाते नजर आ जाती तो जितेन्द्र के साथी (जो लभली को ढूँढने के ड्युटी में ही लगे थे) फौरन जा के कहते "भउजी दिखी हैं बे उहां चार्ट खा रही हैं, चार गो अउर लईकी साथे है"... इधर जितेन्द्र बाबू मुंछ वुछ भुंड करवा के फेवर एंड लवली चेहरा पे खरच के अइसे शरमा रहे हैं जइसे कि आज फिर दुल्हा बनेंगे, बार बार नयका रुमाल से चेहरा का पानी पोंछ रहे हैं।। लजाते हुए उस तरफ जाते हैं जहाँ लभली भी खड़ी है सहेलियों से अलग होके।। उन दोनों का मिलन से दोनों तरफ के अगुवा बराती लोग इतना खुश हैं जैसे ये लोग भी वार्ड पार्षद का चुनाव जीते हैं।। 

तरह-तरह की बातें हैं उधर रामलीला आयोजनकर्ता के पंटर लोग जींस टिशर्ट टोपी चश्मा झार के भीड़ को हैंडल कर रहे हैं ... इधर गाँव घर से आए लड़कों का शिकायत है कि "ई सरवा खाली लईकिन के कुर्सी पे बइठा रहा है, हमनी के लखेद देता है जब ना तब डंटा लेके"... 

उधर मंगरुआ ठेला लगाया है खुब निहाल है मेला में फोचका बेच के, बगल में बबन काका भी जलेबी छान रहे हैं, भीड़ इतना कि अधपका जलेबी भी खाने को लोग बेचैन हैं। 

तभी पंडाल के भोंभा से आवाज आती है.. " श्री श्री श्री 1008 नव युवा एकता मंच दुर्गापूजा समिति हर साल के भांति आपका हार्दिक हार्दिक अभिनंदन करती है और करती ही रहेगी, लोगों से निवेदन है कि आगे बढ़ते जाएं, पुजा पंडाल में भीड़ ना लगाएं"..

इधर कुछ लड़के हैं जो गाँव-घर के छटुआ हैं, उन सब का मन है कि रात में 12 बजे के बादे घर जाना है जब रावण मरा जाएगा" फिर घर पे बाऊजी से बात सुनने के डर से छोटा भाई या घर के बच्चा का ड्यूटी होता है कि रात में दरवाजा खोले"... 


आजकल तो छोटे कस्बे या छोटे शहरों में भी रात में घुमने का ट्रेंड चल गया है, उन वीआईपी लोगों का ऐसा मानना है कि "रात में भीड़ कम होती है, अच्छा रहता है".. 


यही कुछ खट्टी-मीट्ठी बातें हैं दशहरा मेला की... 

आप सभी को दशहरा की शुभकामनाएँ ।


@Lekh ki duniya 



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