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Showing posts from October, 2021

छठ घाट, तुम और हम

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  सुनों...  हम और तुम छठ करेंगे पूरे परिवार के साथ मिलकर, एक साथ उपवास रहेंगे। यही 'गिरिडीह' के एक सुदूर देहात के पोखरे में घंटों खड़े होकर इस कार्तिक महिने के जड़ाह भोरहरी में रूठे आदित्य को थरथराते हुए मनाएंगे हम एक-दूसरे को दयाभाव से देखते रह जाएंगे। ऐसे में कभी-कभी तो परिवार वालों के लिहाज़ से एक-दूसरे को देख भी नहीं पाएंगे, तब हम पोखरे के पानी में प्रतिबिंबित तुम्हारा मनन्त माँगता हुवा चेहरा देखने का प्रयत्न करते हुए पकड़े जाएंगे।। तुम्हारी 'मुस्कराहट' तब देखते बनेगी.......❤ - निल्ल मेहरा 

यही दशहरा है।

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       यही दशहरा है, जिसमें दीपकवा बाऊजी से पईसा मांगता है दशहरा मेला घुमने के लिए, बाऊजी इशारा करते हैं खुंटी पे टंगे कुरता के तरफ और दीपक तीन सौ रुपया पा के कहता है "सब ले लें".. बाऊजी मुस्का के कहते हैं "अरे ले ल, सब तोहरे त ह, तु ही त हव"...  अलग बात है ये थोड़ा-सा फिल्मी बात लग रहा होगा कि कवनो गाँव के दीपकवा को उसके बाऊजी तीन सौ रुपया कैसे इतना आसानी से दे दिए होंगे... पर चलिए मैनेज किजीए हर बाप एक जैसा नहीं होता है महराज आदमी-आदमी पे निर्भर करता है, पर ऐसा मत समझिये हुजूर हर बाप का एक मजबूरी होता है, हो सकता हो 300 रुपये में ही उसे सबको मेला दिखाना हो जो कि आज संभव नहीं है, पर कभी था तो मैं तभी की बात कर रहा हूँ या हो सकता है अभी भी कहीं गाँव देहात में ऐसा हो!! भैया सब के जमाने में तो 300 में बहुत था.. तब हम पहली बार जिद्द कर के घर से 100 रुपया लिए थे और कुछ दस टकिया नोट भी जिसके गर्मी से कॉलर उठा के गए थे मेला देखने वही छोटका, रजुआ, मुकेशवा के साथ ।। तब 3 रुपया में दो सिंघाडा मिलता था, 6 रुपया में फुल प्लेट चार्ट, जलेबी 7 रुपये पउवा था।। रास्ता में कोई ह...

बाईक है मेरी लेके आऊंगा

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छोटे शहरों में कॉलेज जाने वाली लड़कियाँ भी कितना ख्याल रखती हैं सबका...और इस क्रम में उनके आईने के सामने खड़े होने के वक्त में इजाफ़ा होने लगता है, बिंदी किसी के पसंद की लगानी होती है, दुपट्टा माँ के हिसाब से जो अंग को भरपूर ढक ले, लिपस्टिक थोड़ा हल्का कि मोहल्ले की आंटियां तंज ना कसें, कपड़े बाउजी के मन का ताकि समाज में उनका इज़्ज़त बरकरार रहे.......... और छोटे शहर के लड़के अक्सर लेट आते हैं मिलने उस ओढ़नी से चेहरा बांधे खड़ी लड़की से जहाँ इंतज़ार कर रही वो बहुत घबराई हुई बार-बार घड़ी देखती है और एक डर जो हमेशा सताता है "कोई देख ना ले"..... सोचता  हूँ   कि  बंद  कमरे  में , एक शमआ-सी जल रही होगी । शहर की  भीड़-भाड़  से   बचकर , तू   गली   से  निकल  रही  होगी  । - दुष्यन्त कुमार लड़के को लेट इसलिए होता है कि वो हिरो बनना चाहता है कहानी का, बड़बोलेपन में कहता है "बाईक है मेरी लेके आऊंगा".. बाईक के जुगाड़ में वो पुरा शहर छान देता है, अंत में किसी दोस्त के फुफा के चचरे भाई के साले की बाईक ...