दुस्कर्म का बढ़ता प्रकोप और हम

                      दुस्कर्म का बढ़ता प्रकोप और हम 



देश में मानवता को शर्मसार करने वाली जघन्य अपराधों के मामलों में तेजी से इजाफा हो रहा है, चाहे निर्भया कांड का परिणाम या हैदराबाद वाला इन्काऊटर उससे भी आज हैवानियत नहीं थम रही है,

पिछ्ले दिनों हैदराबाद के सैदाबाद इलाके से 6 वर्ष की नाबालिक की दुष्कर्म का मामला सामने आया था, अब दुष्कर्म का ताजा मामला हजारीबाग के दारु इलाके का है।

मिली जानकारी के मुताबिक हजारीबाग में दारु थाना के अन्तर्गत गोपलो के एक नाबालिक के साथ सामुहिक दुस्कर्म की वारदात को अंजाम दिया है, 
इस सम्बंध में पीडिता के बयान पर पोक्सो एक्ट के तहत दारू थाना में प्रार्थमिकी दर्ज की गई है, मिले बयान के अनुसार 18 सितंबर की सुबह ही, पीड़िता अपने घर से 100 मिटर की दुरी पर अपने शहेलीयौ के साथ टहलने जा रही थी, इसी क्रम में  मोटरसाइकिल पर सवार अज्ञात 5 युवकों ने उसे जबरन उठा कर किसी अज्ञात स्थान पर ले जाकर पाँचो युवकों ने इस घटना को अंजाम दिया। 

पीड़िता की ईलाज शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज में चल रही है, जानकारी के मुताबिक हालात गम्भीर बताई जा रही है, वहीं आज तिन दिन होने को है, परंतु 
अभी तक पाँचो अपराधी पूलिस के गिरफ़्त से बहार है। 

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार देश में औसतन 88 दुस्कर्म के मामले रोज दर्ज करवाये जाते हैं। 

कहा जाता है, एक माँ एक बेटी एक बहन इस संपूर्ण मानव जगत के जन्म दाता है, चाहे वह विभिन्न प्रतिरूपों में क्यों ना हो जिनके बिना इस प्रथ्वी पर व्युत्पत्ति के मामलें में एक पुरुष प्रजातियों के जिवन की कल्पना करना व्यर्थ है। 

बड़ती आधुनिकता तथा विकाशील मानव सभ्यता के साथ वासना और पाशविकता का नग्न नृत्य जारी है. जब ऐसे दुष्कर्मों के विवरण समाचार माध्यम से देश भर में पहुंचते हैं और उनकी चर्चा होती है तो हमें भी वैसा ही कष्ट होता है जैसा पीड़िता के परिवार को, एक परुष होने के नाते मस्तक शर्म से झुक जाता है. क्या हो गया है हमारे देश को जहां कभी चारित्रिक शुद्धता बनाए रखने पर ज़ोर दिया जाता था।

परिवारों के बड़े बूढ़े घर की चार दीवारी में पलतीं अपनी संतानों को शिशुत्व से लेकर पूर्ण यौवन तक संभाले रखने के प्रयास में धार्मिक, संस्कृतिक और सामाजिक मर्यादाओं में बांधे रख कर संयत संतुलित जीवन जीने के लिए प्रेरित करते थे.

लेकिन आज इसके ठीक विपरीत उन लोगों की संख्या में वृद्धि हो रही है जो पारिवारिक संस्कारों को नकारते, अश्लीलता के पक्षधर बने बेठे हैं, मनता हूँ आधुनिकता आई है संसाधनों के विकाश से मानव जीवन शुलभ हुवा है,
परन्तु इनके विपरित विक्र्त प्रभाव में लगातार वृद्धि हो रही है। 

पोर्नोग्राफ, बॉलीवुड के अश्लील शॉटस एवं पच्मि स्म्भ्यता के छोटे छोटे कपड़े और मुख्य रूप से देखें तो नैतिक शिक्षा का अभाव ही मानवता को शर्मसार करने वाली जघन्य अपराधों का करण बनी हुई है, तात्कालीन समय में स्मार्ट्फ़ोन्स के सोसल मिडिया की स्मार्ट्नेश इतनी बड़ गई है, की लोग चन्द पसंद और दर्शकों की  संख्या बटोरने हेतू इतनें अश्लील शॉट वीडियो पोस्ट कर रहे  हैं जिसको देखना किसी अनैतिक व्यक्ति के लिए हवस वाली मानसिकता विकशीत करने के लिए पर्याप्त है। इस वीडियो का प्रभाव केवल अनैतिक व्यक्ति तक सिमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव देश के उन सभी  करोडों बच्चे पर पड़ रहा है जो एसे शॉर्ट वीडियो वाले प्लेटफार्म पर शक्रिय रहते हैं, जिसका पुर्ण जिमेदार वेसे माता पिता या अभिभावक होते हैं जो अपने बच्चों के क्रिया-कलापों का ध्यान नहीं रख पाते। 

कुछ लोगों का मानना है कि, सोशल मीडिया, पोर्नोग्राफ, बॉलीवुड के अश्लील शॉटस और छोटे कपड़े का उपभोग क्यों ना करें हमें व्यक्तिगत और देहिक सव्तंत्र्ता प्राप्त है, परन्तु आपके सव्तंत्र्ता का बुरा प्रभाव संपूर्ण देश को है, तो आप अपनी सव्तंत्र्ता का दुर्पयोग कर रहे हैं, और इस प्रकार के मानसिकता वाले लोग दुष्कर्म जैसे घटनाएँ का पक्षधर बने बेठे हैं। 

पक्षधर की बात करें तो कूछ मामलों में पुलिस-प्रशासन, राजनेता,और कुछ संगठन के लोग भी पीड़ित परिवारों से केश वापस लेने, स्टेटमेंट बदलने को लेकर दबाव बनाकर अपराधियों के संरक्षण में रहती है।   

बदहवास वासना की शिकार हो रही नारी जाति में जिन बहू-बेटियों, बहनों और माताओं की मान मर्यादा भंग होती है उनकी और उनके आहत परिवार परिजनों की पीड़ा का सही आकलन मात्र बहसों के माध्यम से किया जाना संभव नहीं है।

कानून के हाथ भले कितने भी लम्बे हों तब तक नाकाम सिद्ध होते हैं जब तक ऐसे अपराधी उसकी पकड़ में नहीं आते और वे तब तक पकड़ में नहीं आते जब तक उनकी दरिंदगी के सबूत नहीं जुटते. ऐसा लगता है कि अपने देश में अब कानून का भय भी कोई भय नहीं रहा. सर्वत्र भ्रष्टाचार का बोलबाला होने से अपराधी बचने के रास्ते ढूँढ निकालता है.


इन स्थितियों में बलात्कारों की रोकथाम के प्रभावी उपायों की आवश्यकता को कैसे पूरा किया जा सकेगा? स्पष्ट है कि गंभीर से गंभीरतम होती इस समस्या के समस्त पहलुओं पर अथासंभव ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है।

सर्वप्रथम बिना किसी भी पूर्वाग्रह के यह रेखांकित करने की ज़रूरत है कि अपने आस पास के परिवेश में कौन से ऐसे तत्व हैं जो कामवासना के आपराधिक प्रसार में सहायक हो रहे हैं?

ऐसा क्या है जिसके कारण कोई भी व्यक्ति इस हद तक नीचे गिर सकता है कि बच्चों तक के साथ ऐसी जघन्य पाशविकता का व्यवहार करता है? विश्व में भारत का दर्जा एक सभ्य संस्कृति सम्पन्न देश का है.

लेकिन अब न सिर्फ विदेशी महिला पर्यटकों के साथ होने वाले दुष्कर्म की घटनाओं के कारण भारत के नाम पर कालिख पुत रही हैं बल्कि सामूहिक बलात्कारों के दर्दनाक विवरण विश्व भर में चर्चा का विषय बने हैं. ये घटनाएं घोर अमानवीयता और असभ्यता के घृणास्पद प्रतीक चिन्ह हैं।

इस परकोप से माँ बहन बेटियों के संरक्षण में सरकार अपने कानून व्यवथा और भ्रस्ट प्रषासन को दुरुस्त करे, कानून का पालन कराने के लिए सरकार से मांग करना जनता का हक है।

 त्यागपत्रों की मांग को भी जनता के द्वारा प्रशासन को एक चेतावनी माना जा सकता है कि कोताही उसे स्वीकार नहीं है. इस बीच समाज के प्रबुद्ध नेताओं के द्वारा इस समस्या के सभी पक्षों पर अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर आत्ममंथन की आवश्यकता है।

इसके साथ साथ नारी के द्वारा भी इस पर विचार करने की आवश्यकता है कि कहीं वह स्वयं अपने शरीर की नुमायशों में शामिल होकर और सेक्स उन्मुक्तता को बढ़ावा देकर पश्चिम की नारी की तरह मात्र उपभोग की वस्तु मानी जाने की भूल तो नहीं कर रही.


आज हमरे बिच ईमानदारी से उत्तर की मांग करता एक ही प्रश्न है कि क्या सचमुच भारत को ऐसा ही समाज चाहिए जिसमें न सुरा का अभाव हो और न सुन्दरी का?

जहां पुरुषों और स्त्रियों में यह स्वर भी सुनाई देने लगे कि ‘यह मेरा शरीर है मैं इसके साथ जो भी चाहूं करूंगा या करूँगी?

यदि इसका उत्तर हाँ में है तो फिर एक सभ्य सँस्कृति समाज की कल्पना करने   
की  गुंजायश नहीं रह जाती।

यह भारत में भी उसी अपसंस्कृति के कदम जमाने के संकेत हैं जो सर्वत्र सेक्स प्रधान समाज की रचना में व्यस्त है, ऐसे समाज में ही पलते हैं नरपिशाच भी जो हर लक्ष्मण रेखा को लाँघ कर कामोत्तेजक साधनों की सहज उपलब्धि के साथ अनियंत्रित होती अपनी वासना का शिकार भोली भाली बालिकाओं तक को बना रहे हैं.


- निल्ल मेहरा उर्फ़ (नितीश कुमार)
      गिरिडीह।













Comments

  1. मेरे प्रिय पाठकों मुझे आशा है कि मैं इस लेख के माध्यम से आपके दिलों तक पहुँच पाये होंगें तो आप इस लेख को अपने मित्रो और शुभचिंतको के साथ साझा करें ताकी हमारा समाज दुस्कर्म जैसे जघन्य अपराधों से मुक्त हो सके।

    अगर गलत को गलत नही कह सकते हैं,
    तो आपकी शिक्षा व्यर्थ है।।

    अगर बोल नही सकते तो, लिखिये
    अगर लिख नहीं सकते तो, पढिए
    अगर पढ़ नही सकते तो, इसे किसी और के पास भेजिये।

    लेख की दूनियाँ की और से आप सभी को
    धन्यवाद 🙏।

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  2. बहुत अच्छा लगा आपके विचार को लेख के माध्यम से जान कर इसी तरह अपने विचारो को दर्शाते रहे और समाज को सही दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहे।
    धन्यवाद 👏👏

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