कोरोना की तिसरी लहर/ Corona third wave
वैशाख मास जा चुकी है,खेत में खिरा ककरी तरभुज (जेठूवा) लहलहा रही हैं, पुरवईया के लहर से खजुर पेड़ में माटी के लभनी भरने लगी हैं, आम का पेड़ चटकदार आचार वाला आम केलिये बिल्कुल तैयार है।
वैशाख - ज्येठ हर किसी को अपने लहर में सराबोर कर चुका है। मतवाले मन को भोर की हवा में घुली मॅंजर की खुशबू एक अलग संसार में ले जा रही है, मैं दावे के साथ कहता हूँ एक अलग मादकता होती है इस खुशबू में, और इस खुशबू की जगह कोई इत्र या परफ्यूम नहीं ले सकता है।
चिड़ियों की चहचहाट में कोयल भी अपनी मीठी बोल से मोहित कर रही है, पर वो सबको मोहित भी कहाँ कर पा रही है! बाकी एक सप्ताह से मौसम बिग्ड़ेल सी हो गई है।
कोरोना की दुसरी लहर अपने चर्म सीमा पे है, और शादी बियाह लगन का स्वेग एक अलग लेवल पर चड़ बेठा है, यहाँ हर दसवें व्यक्ति में एक कोरोना
संक्रमित है। कितने सपने आशा अरमान रोज अस्पताल की चोखट पर अपनों का साथ छोड़ती जा रही है, अपंग होती हेल्थ सिस्टम और सरकार से अब शमसान भी बिलख उठा है की भाई अब तो सुधार जाओ ।
"कहा जाता है की होठों पे सच्चाई रहती है, जहाँ दिल में सफ़ाई रहती है,,
हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है।। "
लेकिन आज मानवता को शर्मसार करती गंगा में बह रही सेकड़ों पार्थिव शरीर आज साबित कर दिया है कि देश किन संकटों से गुजर रही है।
कोरोना की तीसरी वेभ इससे भी भयावह होने वाली है, क्या पता कल हमारे बिच से ही किसी का साथ छुट जाय, जिन्हें लगता है कि कोरोना बस एक मजाक है,
तो बता दूं की हमने अपनी नजरों के सामने ढलती सांसों को बड़े करीब से गिना है, बहुत ही भयावह स्थिति होती है।
लोगों की गिरती आजीविका और छात्र छात्राओं का भविष्य फिर से अपनी कमर कस ही रही थी कि कोरोना वेभ 2 का प्रहार से जमिन छू बेठी,
इतने बड़े मुसीबत में आज सरकार की नाकामियों की वजह से महंगाई आसमान छू बेठी है, मै पुरा अकिन के साथ कह सकता हूँ कि तीसरी लहर कोरोना नही बल्कि महंगाई होगी।
प्रदेश कमाने वाले और शहरों में पढ़ने वाले लड़कों का पलायन फिर से घर की और चल पड़ी है, कुछ हीं दिनो में बेरोजगारी सर छुवेगी, और इस बार की कयामत बहुत ही भयावहता रूप लेने वाली है।
जिस प्रकार बीते साल औरंगाबाद में 16 प्रवासी मजदूरों की भूख हमेशा केलिए उन रेल की पटरी पर बिखर के रह गया था, अपनो से मिलनें की आस, माँ की ममता, साइकिल गर्ल की दिलेरी, भूख से सडकों पर चीखते बिलखते लोग, ना जाने इस प्रकार के कितने लोग थे जो उस कोसों दूर की काली सडकों को नाप कर लहू-लुहान कर दिया था ।
उस वक्त हमारा सिस्टम सरकार और सत्ताधारी गौ मूत्र, गौबर, ताली थाली करवाने में व्यस्त थी। हमारे देश के प्रवासी मजदूर हो या विधार्थी कभी उस पल को भुल नही सकता, जिसका हिसाब एक एक कर लिया जायेगा , सुरुवात चुकी है, जिसका ताजा ताजा उदाहरण कोलकता चुनाव है।
आज हमार देश दुसरे देशो से मदत लेने के लिए बाध्य हो चुका है आखिर क्यों?
बहुत सा देश है जिनका पहले कोरोना के मामलें में हालात काफी बिगड़ी हुई थी, पर आज उन सब का हालात काफी बेहतर है आखिर कैसे और क्यों?
हमारे यहाँ जब भी सरकार से शिक्षा व्यवथा को लेकर सवाल खड़ा किया गया है, तब तब राजनीतक मुद्दा, धार्मिक मुद्दा, तो कहीं JNU, jamiya, bhu जैसे विस्वविध्यालय को सब्सिडी खोर आदी जैसे अभद्र शब्दों का टेग लगकर उन्हें कमजोर करते आई है।
हमारी सरकार जिस धुण में मंदिर मस्जिद के धार्मिक चक्रो में बौखलाए हुए रहते हैं ना, उतना अगर सिक्षा व्यवस्था पर एक बार ध्यान दे दिया गया होता तो आज इतना बड़ा महामारी का सामना ना करना पड़ता ।
इसे देश का दुर्भाग्य ही समझना बेहतर है कि कुछ लोग को शिक्षा,स्वास्थ, रोजगार नही बस उन्हें मंदिर और मस्जिद चाहिये जिसका परिणाम आज पुरा देश मिलकर भुगत रहें हैं ।
कभी देखे हो ग्रमीण इलाकों में सरकारी विधालयों की क्या हालात हो गई है,
टूटी फूटी छत,खिड़की , दरवाजा और टूटे फुटे शिक्षा का स्तर, 400 - 500 बचौं में से 2 से 3 शिक्षक जो खुद ही अप्ने कार्यालय कार्य एवं निजी कोचिंग संसथान में व्यस्त रहते हैं ।
मंत्रि और नेता से सरकारी स्कूल और कॉलेज की एजूकेशन सिस्टम को दुरुस्त करने का मांग करते ही, भ्रस्ट नेताओं का अस्वासण मिलता है, राज्य में नये स्कूल और कॉलेज बनाये जाएंगें, पर पुरानी समस्या के निदान की बात कभी नहीं करेंगें ।
आखिर क्यों करे हमारा और आपका समस्याओं का निदान, बनने वाले नये कॉलेज और स्कूल लागत से 15% 20% ना मिले तो उसके बेटे बेटियाँ विदेश में कैसे पढेंगे।
आगे अग्ली कड़ी में:- waiting.......
निल्ल मेहरा (नितीश)
गिरिडीह

👌👌👌
ReplyDeleteहमसे जुड़ने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद ।
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