फगुआ
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फाल्गुन मास अपने चरम पे है। गेहूँ-मटर पकने के ओर हैं, ताड़ में बलुरी की लड़ियाँ टॅंगने लगी हैं, आम का पेड़ मॅंजर (मोजर) पकड़ बैठा है। फगुनहट हर किसी को अपने लहर में सराबोर कर चुका है। मतवाले मन को भोर की हवा में घुली मॅंजर की खुशबू एक अलग संसार में ले जा रही है, मैं दावे के साथ कहता हूँ एक अलग मादकता होती है इस खुशबू में, और इस खुशबू की जगह कोई इत्र या परफ्यूम नहीं ले सकता है।
चिड़ियों की चहचहाट में कोयल भी अपनी मीठी बोल से मोहित कर रही है, पर वो सबको मोहित भी कहाँ कर पा रही है! आईये देखते हैं कैसे!
दोपहरी के मध्य में जब भौजाई चुल्हा-चौकी फरिया के ढाबा में मचिया पर बइठ के बाल सूखाने बैठतीं हैं, जब ऐनक में खुद को निहारते हुए के लिलार के बीच में बिंदी साटती हैं (फागुन में खासकर बिंदी साटती हैं), इंगुरवटी में अनामिका अंगुरी बोर के जब माथे पे सुहाग सजाती हैं तब उस कोयल की बोली उनके कानों में पड़ती है। उन्हें लगता है इ कोयलरिया भी उन्हें ताना दे रही है मानो उनसे कह रही हो कि उनके पिया प्रदेश में जाके उन्हें भुल गए हैं और इस फागुन भी नहीं आएँगे। मन ही मन खिसिया के भौजाई मुॅंह बिजुकाती हैं, कोयल को गरियाती भी हैं "भाग रे अगलगवनी, आउ त मुड़ी ममोर के चुल्ही में झोंक दीं।"...
फिर क्या...!
क्या भोर, क्या दोपहरी, क्या गद्दबेर, क्या सॉंझ, क्या रात...हर पहर भौजाई इस उधेड़बुन में डूबती-उतराती रहती हैं कि कवनो सौतन की फेर में उहाँ के अझुरा तो नहीं गए हैं...
(सैड म्यूजिक... डहके जियरा, नैना लागे, पिया बिन ससुरा सूना लागे...)
कुछ वही हाल है गाँव के कुॅंवारे लड़कों का जो बिहार पुलिस की भर्ती परीक्षा सहित ना जाने कितनी परिक्षाएँ देके आएँ हैं। वे दिन उनके जीवन से चले गए जब वे गेंहूँ और मटर का होरहा खाते दिन बीता देते थे। एक दौर रहा था जब वे जानबूझकर कोई पिनकाह बुजुर्ग के खेत से मटर चोरी करते थे, पकड़ाते थे, तब वो बुजुर्ग मनई यही कह के भजन का उद्घाटन करता कि... "जा तोहरी महतारी के माथ बान्हो हमरे खेतवा पे नजर गड़वले बाड़ऽ लोग।"
पर अब उन लड़कों के जीवन में वो दिन नहीं रहा, वो फागुन नहीं रहा, वो बुजुर्ग नहीं रहे, उनकी गालियाँ नहीं रहीं... बहुत कुछ नहीं रहा क्योंकि वे निकट के शहरों में डेरा जमाकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारियों में लग गए हैं। इस आस में कि सरकारी नौकरी लगे, माथ पे मउर चढ़े, हालांकि ये उनके और उनके परिवार का साझा आस है, हो भी क्यों ना! इस देश में अभी भी विवाह भी एक विकट समस्या है चाहे वो लड़के का विवाह हो या लड़की का। हालांकि ये लड़के किशोरावस्था और व्यस्क होने के गैप में यह जरूर चाह रखते थे कि समाज बदलेंगे, समाजिक बुराईयों को दूर करेंगे, शिक्षा-स्वास्थ्य के लिए काम करेंगे और ना जाने क्या-क्या। फिर उन्हें कहीं-ना-कहीं ये आभास हुआ कि उनकी ये बातें सुनेगा कौन ! जब तक एक पदभार नहीं संभाल लेते तब तक उनकी सारी बातें बेतूकी हैं। परिवार और आसपास के लोगों ने भी ज्ञान ढरकाया कि "पहले एक नौकरी पकड़ लो तब ये सब अपने मन की करते रहना...।" कुछ ना कहते हुए भी वे यह सोचते हुए मन मार बैठे कि "नौकरी के बाद किसने क्या उखाड़ा है, वो तो देखते ही बनता है!", "ब्याह किये! बाल-बच्चे किये! फिर सारी बातें भुलकर उन्हीं में लग गए! और जीवन सफल!"
कुछ लोगों ने यहाँ तक भी समझा दिया कि "बेटा! जानते हो हमहुँ जवानी में अइसने कुछ करने का सोचते थे, फिर आगे तुम देख ही रहे हो, कुछ उखड़ता थोड़े है! जवानी में इ लहर एकबार जोर जरूर मारता है पर जिम्मेदारियाँ सबकुछ बदल देती हैं।"
खैर! मुद्दे पे आते हैं यह सब कितना सत्य है कितना नहीं हम नहीं जानते। ये वही लड़के हैं जो पटना, इलाहाबाद, बनारस, दिल्ली पढ़ने के बाद भी होली, दिवाली, और छठ अपने गाँव-घर पे मनाना चाहते हैं और संभवतः घर पहुँच भी जाते हैं ट्रेनों मे ठूसाकर, बसों में लदाकर, जीपों के पीछे लटक कर, यानी जैसे भी संभव हो। और कुछ बेचारे पर्व-त्योहारों में भी इस लाज से गाँव नहीं आते कि इसी फागुन में गाँव की कवनो भौजाई या मामी बियाह को लेकर ताना कसेंगी, अपनी फुफेरी-ममेरी बहनों का फोटो व्हाट्सएप पे दिखा के कहेंगी कि "अबकी इनकरो बियाह होता,लइका एअर फोर्स में बा, आ जी बबुआ! रउवा कब नोकरिया लेब?" ...तब क्या कहेंगे रघु भईया! बताईये जरा!
रघु भईया, जिनका प्रेम छठ घाट पे परवान चढ़ा था वो आरा छोड़कर भी गाँव में कहाँ चैन से हैं! उनको भी आए दिनों गाँव के लफुए लड़के, लंठ अधेड़ से लेकर भौजाईयाॅं कहती ही रहती हैं कि.... "जाए द! नोकरी ना भईल त का भईल अब बियाहावा कई लऽ, कब ले बाउजी के रोपया पे ग्लैमर पे आरा वाली छवड़ीन के घुमइबऽ बबुआ।"
पर ई फगुआ है ना बहुत हेहर चीज़ है। इ कहाँ मानता है!
इसपे किसका जोर है! मन बदल देता है, खॉंटी ग्रामीण अधेड़-बूढ़ों के मोछ पे जवानी का ताव अईंठाने लगता है।
हम ऐसे गाँवों की कल्पना करते हैं या यह कह लें अभी भी भारत में ऐसे गाँव जिंदा है जहाँ क्या बाभन, क्या भूमिहार,क्या यादव,क्या राजपूत,क्या कुर्मी-कुशवाहा, क्या दुसाध,क्या चमार, क्या तेली-बनिया, क्या लोहार-बढ़ई, क्या मुसलमान और भी ना जाने अनगिनत जातियाँ सब एकसाथ जात-धर्म और द्वेष-दुश्मनी भुलाकर फागुन के रंग में रंगा जाते हैं,भांग घोराने लगता है। ढोलक-झाल मज़िरा का साज-बाज ठाकुरबाड़ी में गुॅंजने लगता है। अलबलाए हुए मनशोख नवही लफुए जब ढोलक-झाल थाम के ये राग अलापते हैं कि...
"आ ले चलें तुम्हें मुखिया जी के रहर में,
फगुआ में ये दुनिया हमें प्यार ना करने देगी"...
तब उधर से सोहराई महतो धोती का पछुआ खोंसते हुए लाठी लेके दौड़ते हैं और लड़कों को एक हूर देके गरियाते हैं.."सार तू नाहीं! तोहरी मौसी के जोबन ध के रियाज कराओ, इहे गीत गवाला रे!"... गिरते-भहराते लड़के ठठाकर हॅंसते हुए फरार होते हैं और कहीं छुप जाते हैं। तब कोई रामजतन अहीर माइक थाम के पारंपरिक राग अलापते हैं...
"बाबा हरिहर नाथ सोनपुर में खेलें होली, बाबा काशी विश्वनाथ काशी में खेलेलें होली... है... बाबा ब्रह्मेश्वर नाथ खेलस ब्रह्मपुर में होली, बाबा भृगु नाथ बलिया में खेलें होली...फिर ... "गोरिया करि के सिंगार अँगना में पिसेली हरदिया...कन्हैया घरे चलु रे गुईयाँ आजु खेले होरी..."
कोई मुन्ना सिंह की मेहरारू जो पंचायत की वर्तमान मुखिआइन हैं (पर कार्यभार मुन्ना सिंह ही संभालते हैं) उनके संदर्भ में गाया जाता है कि...
"मुखिआइन बड़की छिनार,सबकोई ले वोट डलवइहें... है... (कोरस में) भउजी बड़की उड़नबाज सब फंड अपना पेटी में डालि जइहें।" गीत सुनकर मुन्ना सिंह मुॅंह पे गमछा डाल के निर्लज हॅंसी हॅंसते है। अलग-अलग गीतों के माध्यम से हॅंसी-मजाक और छेड़खानी भरी बातों से मन सराबोर हो उठता है।
वही लफुए जो मुखिया के रहर में ले जाने की राग अलाप रहे थे, वे गाँव की भौजाईयों पे रंग फेंक के फरार हो जाते हैं, पिया के इंतज़ार में उदासीन बैठी किसी भौजाई को देखते ही गाने लगते हैं... "सूना-सूना लागेला सेजरिया तोहरा बिना, आ भलहीं तू चलि जइहा देके एगो चिन्हा... बन के पवनवा आजा राजाजी.... हरदम जे रहबा बंगलोर..!" तब भौजाई कवनो हड़ाह गाली देके ढेला चला के उन्हें भगाती हैं।
इसी फागुन में रघु भईया का यार जितेंद्र जीउवा गवना करा के मेहरी लाया है और होम थियेटर पे खूब तेज साउंड में बजा रहा है "होली ह बियाहल के बंडन के तलसावेला, केहू करावे गवना हाली केहू जोगाड़ लगावेला"... तब गाँव के सर्टिफाइड कुॅंवारों का जीउ जर जाता होगा, उन कुॅंवारों के नज़र में जितेनदरा से बड़का दुश्मन कोई नहीं होता होगा,और उनके मंडली की नज़र अबकी फागुन में जितेंद्र बो पे पड़ती होगी कि अबकी फलाना गाँव का फगुआ भौजाई याद ही रखेंगी। जितेंद्र से लेने लायक इससे बड़ा बदला क्या हो सकता है!
तैयारी फगुआ की जोरों पे है...
भानु प्रताप सिंह
आरा, बिहार
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