फगुआ _____ फाल्गुन मास अपने चरम पे है। गेहूँ-मटर पकने के ओर हैं, ताड़ में बलुरी की लड़ियाँ टॅंगने लगी हैं, आम का पेड़ मॅंजर (मोजर) पकड़ बैठा है। फगुनहट हर किसी को अपने लहर में सराबोर कर चुका है। मतवाले मन को भोर की हवा में घुली मॅंजर की खुशबू एक अलग संसार में ले जा रही है, मैं दावे के साथ कहता हूँ एक अलग मादकता होती है इस खुशबू में, और इस खुशबू की जगह कोई इत्र या परफ्यूम नहीं ले सकता है। चिड़ियों की चहचहाट में कोयल भी अपनी मीठी बोल से मोहित कर रही है, पर वो सबको मोहित भी कहाँ कर पा रही है! आईये देखते हैं कैसे! दोपहरी के मध्य में जब भौजाई चुल्हा-चौकी फरिया के ढाबा में मचिया पर बइठ के बाल सूखाने बैठतीं हैं, जब ऐनक में खुद को निहारते हुए के लिलार के बीच में बिंदी साटती हैं (फागुन में खासकर बिंदी साटती हैं), इंगुरवटी में अनामिका अंगुरी बोर के जब माथे पे सुहाग सजाती हैं तब उस कोयल की बोली उनके कानों में पड़ती है। उन्हें लगता है इ कोयलरिया भी उन्हें ताना दे रही है मानो उनसे कह रही हो कि उनके पिया प्रदेश में जाके उन्हें भुल गए हैं और इस फागुन भी नहीं आएँगे। मन ही मन खिसिया के...
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