आज के टाइम में मजदूरों की हालत

आज के टाइम में मजदूरों की हालत गंभीर है। कल भी थी, कई सालों से थी लेकिन कोरोना काल में कुछ ज्यादा ही स्थिति गम्भीर हो गयी है। 
मजदूर को वोट बैंक कहे तो गलत नही होगा। लोकसभा और विधानसभा चुनाव में रैली को महारैली बनाने के लिए नेताओं द्वारा सैकड़ो बसों में भर भर कर आदमी लाया जाता था! ताकि भीड़ ज्यादा इकठ्ठा हो सकें। उन्हें तो बस वोट चाहिए और कुछ नही।
अपना काम बनता,भाड़ में जाए जनता। 

आज सड़कें पूरी तरह सूनी नजर आ रही है। चुनाव में करोड़ो खर्च करने वाली पार्टियां अपने चुनावी मुद्दा खोजने में व्यस्त है। 

देश के सभी राज्यों के सड़कों पर वर्तमान में गाड़ियां कम लुटे पुटे मजदूर ज्यादा चल रहे हैं।
मई के धूपों ने सड़को को आग बना दिया है, मजदूर फिर भी चल रहे है। उन्हें कहाँ प्रवाह है आग उगलते धूपों की! उन्हें तो अपने घरों और पेट की प्रवाह है। उन्हीं धूपों में चलते हुए मजदूरों की चप्पलें टूट चुकी है।

उनके द्वारा ही बनाई गई सड़के उनके पैरों को छील रही है और जला भी रही है। 
कोई अपने बच्चों को सूटकेस पर सुला कर ला रही है तो कोई अपने पिता को साइकिल पर बिठाकर सैकड़ो किलोमीटर के रास्ते को नाप रही है।
राज्य और केंद सरकार के सैकड़ों घोषणाओं के बावजूद भी मजदूरों तक कुछ खास नही पहुँच पाई। योजना आजकल क्रश बनकर रह गयी है, आते आते हाथ से फिसल जाती है! आप सिर्फ उसे दूर से ही देखकर खुश हो जाएं।

एक के बाद एक लॉकडाउन आते गया और अपने घरों से दूर मजदूर घर आने को तरसने लगे! 
बहुत सारे बुद्धजीवी मिलेंगे जो कहते फिरते है घर आने की क्या जरूरत है, जहां है वहीं रहें!
उन बुद्धजीवियों को पता नही है कि पेट नाम की भी कोई चीज होती है! घर में बैठकर सुगर फ्री वाला चाय का आर्डर सुबह शाम बीवी को देकर मजदूरों के हालात का पता नही चलेगा आपको।

सरकार सब कुछ कर रही है, कहने वालों को पता होना चाहिए कि सरकार सचमुच बहुत कुछ कर रही है लेकिन मजदूरों के लिए नही पूंजीपतियों के लिए।

सिर्फ नियम बनाने और लागू करने से कुछ नही होता है। नियम बनाने और लागू करने से पहले अपने समस्याओं को दूर करना पड़ता है। 
अगर समस्याओं को दूर नही किया जाए तो वहीं समस्या उस नियम की ऐसी की तैसी कर देती है। यही हो रहा है अभी। 

भारत में एक अनुमान के मुताबिक दिहाड़ी मजदूरों की संख्या 4 करोड़ से 12 करोड़ के बीच में है। 
इनमें से कितने लोग सड़कों के रास्ते, पटरियों के रास्ते पैदल घर निकल चुके है कहना मुश्किल है।

ये सिर्फ सरकार के विफलताओं का कारण है। कोरोना ने जब भारत के दरवाजे को खटखटाया था, तभी बहुत सारे चीजों को कंट्रोल किया जा सकता था! लेकिन मध्यप्रदेश में सत्ता पाने के लालच में भला कहाँ कुछ दिखता है।

Abhijeet Mehra

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