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कुल्हड़ वाली चाय

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  भले हीं बदनाम फिरंगियों सब उपनिवेशवाद के चकर में इहाँ के लोगों को अंग्रेजी सभ्यताओं से संक्रमित करने का प्रयास किया, फिरभी यहां की कला सँस्कृति को धुंधुर करने में फेल रहा, तनी ऊ बात अलग हे की आज कल के लड़की सब छोट छोट कपड़ा पहीन के रील वीडियो में लाईक और फॉलोवर्स बटोर रही है। जानते हैं ऊ अंग्रेजवा लोग प्रचार करने के लिए पश्चिम से अपने साथ वहाँ के सभ्यता को दू तिन झोला में खँच कर भर के लेके आया था, लेकिन का कहिये गा हमरे यहां के लोग तनी ललचीया किस्म के मणूष होता है, टेस्ट करने के नाम पर जहर को भी फ्री में बाँट दिया जाय तो खुसी खुसी चाट के मर जायेगा।   और यही टेस्ट करने के चकर में यहां के रजवाड़ों ने अपना उंगलि ऊ ससुर अंग्रेज के हाँथ में थमा दिया फिर का है साला यहां के गोलकी चखने के बाद सीधा कपार पर चढ़ के  1858 से 1947 तक तानड़ाव कर दिया, और फिर का है इहाँ के लोग थोड़ा ललचिया जरुर हैं लेकीन मूरख नहीं उल्टी हांथे झोला थमा के इहाँ से विदा कर दिये ऊ ससुर सब तो चल गया लेकिन उकर भी फरज  बनता था की अपने दामाद सब खातिर कुछ छोड़ के जायें, जानतें हैं जी ऊ लोग भी ना गजबे क...