इस क्षण तक बाबा साहब
देश आज़ाद हो गया था। संविधान सभा की आख़िरी बैठक चल रही। गणराज्य की स्थापना की तैयारियां आख़िरी दौर में थीं। संविधान सभा में राय बनी कि मामले पर बहस का समापन बाबा साहब भीमराव आंबेडकर करें और उन सवालों का जवाब दें जो इस सिलसिले में उठे थे। जिस व्यक्ति को सिर्फ ड्राफ्टिंग का ज़िम्मा दिया गया था, उनके लिए यह गौरव का क्षण था। संविधान की ड्राफ्टिंग से आगे बढ़कर बाबा साहब उस समय तक देश के प्रमुख राष्ट्र निर्माताओं के तौर पर गिने जाने लगे थे। तमाम सहमतियों और असहमतियों के साथ संविधान सभा जानती थी कि नए बनते राष्ट्र की चुनौतियों को समझने की एकमात्र समग्र दृष्टि बाबा साहब के पास है। इसलिए नेहरू, पटेल समेत कई वरिष्ठ सदस्यों के होते हुए भी बाबा साहब को यह ज़िम्मा सौंपा गया कि वे बहसों और आपत्तियों का जवाब दें। बाबा साहब का वह ऐतिहासिक भाषण साबित हुआ। ऐतिहासिक इस मायने में नहीं कि इस भाषण में कोई अभूतपूर्व जोश या विद्वता थी। यह एक संयमित और बहुत संभलकर बल्कि सहमकर दिया गया भाषण है। इस भाषण में बाबा साहब नए बनते राष्ट्र की चुनौतियों की ओर संकेत करते हैं और उन चुनौतियों से निबटने का उपाय बताते ...