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हर मनोज के हिस्से में सरधा क्यों नहीं लिखी जाती ?

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  रिपोर्टिंग कर रहा है न इस लड़के की भी एक महिला मित्र थी। इसको छोड़कर वो क्यों चली गयी?? उसका ध्यान किसी को नही है..  सबका ध्यान एक सफल पुरुष की महिला मित्र की ओर है... वो कहता है कि बेटा! तेरा सिलेक्शन नही होगा तो ये तुझे भी छोड़कर चली जायेगी जैसे मेरी वाली चली गयी। और चली ही गयी थी.. पहचानने से इनकार कर दिया था कि घर पर क्यों आये हो?? जिसमें क्षमता है भविष्य है उसी को सब कोई चुनता है, किसी आई.ए.एस  आई.पि.एस या IRS महिला अधिकारी को किसी चक्की वाले से प्यार नही होता.. प्यार होता है सम्भावना से... सुनहरे भविष्य से.. लेकिन बॉलीवुड के दर्शक निखट्ट __ हैं.. लड़कों को जैसे नैतिक बल मिल गया है कि अब ऐसी लड़की से मोहब्बत करेंगे जो उसके साथ तैयारी करे...उनकी गरीबी का मजाक न उड़ाए.. स्टडी मैटेरियल दे.. साथ मे मेहनत करेंगे। दुखः सुख में  साथ खड़े रहेंगे। बाद में ऐसा कहकर सबको चौंका दे कि ये सिलेक्शन हमारी महिला मित्र की वजह से हुआ है..  फ़िल्म देखकर आधी जनता पागल हो चुकी है.. वहीं एक गौरी भैया का जीवन बर्बाद हुआ पड़ा है, भेंड बकरी की जिंदगी में एक शेर बन भी ग...

डियर नीलगिरी

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  हम आद रहे न रहे कम से कम हमारा जन्म दिन तो आद था,प्रत्यक्ष रूप से न सही अप्रत्यक्ष से ही ठीक बर्थड़े विश करने के लिए धन्यवाद😊,जानतीं हो किसी विशेष दिन पर हमारे भीतर किसी कोने में तुम्हारी इन्जार हमेशा से रही है। कैसी हो? सायद इस प्रशन को प्रत्यक्ष रुप से पूछा जाना चाहिए, अगर कभी मिलना हुवा तो जरुर पूछना चाहूँगा। अब लिखना छोड़ चुका हूँ, फिर भी, कुछ सुंदर शब्द कभी डिक्शनरी में जगह नहीं बना पाते। कुछ सुंदर लोग किसी कहानी का हिस्सा नहीं हो पाते। कुछ बातें किसी जगह दर्ज नहीं हो पातीं। कुछ रास्ते मंज़िल नहीं हो पाते। उन सभी अधूरी चीजों, चिट्ठियों बातों, मुलाक़ातों, भावनाओं, विचारों, लोगों के नाम एक नया शब्द गढ़ रहा हूँ । जानती हो हर तारा सूरज होता है और हर सूरज एक तारा। कौन सूरज होगा और कौन तारा, यह धरती से उसकी दूरी तय करती है। जिस दिन कोई तारा अपनी धरती को खोज कर उसके क़रीब चला जाता है, वह उस धरती का सूरज बन जाता है। तुम वही तारा हो, जो असल में सूरज ही है। तुम्हें बस अपनी धरती के पास जाने की देर है ।" छोड़कर जाने वाले एक दिन आपको छोड़कर चला ही जाता है, ज्यादा से ज्यादा आप रातों को...

हम आप और न्यू ईयर 2023

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बच्पन और तईस में केवल बाईस का अन्तर है,जहाँ ऊमर के ताईस होते हीं जिन्दगी काल्पनिक एक्स की तरह इमेजनरी लगने लगता है A फ़ॉर अप्प्ले बी फ़ॉर बॉल जींदगी का सबसे खुबसूरत समय था।। जहाँ A भी अपने और B भी अपने  थे, अब तो A से Z तक के सारे लेटर मिलकर जॉन्दगी के पहेलियाँ सुलझाने में असमर्थ लगती हैं।  बचपन तो आज भी जिन्दा है साहब बस जमाने के जिमेदारी और बदलती  तारीख के अन्तराल में हमारे भीतर का बचपन रोज मरता चला जा रहा है। आज 1 जनवरी 2023 है, इस बदलती हुई तारीख ने अपने साथ हमारे जीवन के कई चीजों को बदला है, 2022 से 2023 तक के अन्तराल मे हमनें कुछ चीजो को खोने के साथ साथ कुछ पाया भी है। तारीख का बदलना हम स्ट्रगल करने वाले किसान माँ बाप के बेटे के लिए ठीक उस प्रक्टिस सेट की तरह है जहाँ 60 मिनट में 100 सवालों को सॉल्व करना हो और उसे कलर करने का कोई एक्स्ट्रा टाईम ना हो टाईम समाप्त होते हीं पेपर छिन लिया गया हो। दुनिया एक स्ट्रगल फेज वाले स्टूडेंट को चाहे कुछ भी कहे पर एक माँ बाप के लिए एक बेटे का बेरोजगा होना दूनियाँ में इससे बुरा कुछ हो ही नहीं सकता,घर की उम्मीदें और कन्धे की जिमेदारी...

कुल्हड़ वाली चाय

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  भले हीं बदनाम फिरंगियों सब उपनिवेशवाद के चकर में इहाँ के लोगों को अंग्रेजी सभ्यताओं से संक्रमित करने का प्रयास किया, फिरभी यहां की कला सँस्कृति को धुंधुर करने में फेल रहा, तनी ऊ बात अलग हे की आज कल के लड़की सब छोट छोट कपड़ा पहीन के रील वीडियो में लाईक और फॉलोवर्स बटोर रही है। जानते हैं ऊ अंग्रेजवा लोग प्रचार करने के लिए पश्चिम से अपने साथ वहाँ के सभ्यता को दू तिन झोला में खँच कर भर के लेके आया था, लेकिन का कहिये गा हमरे यहां के लोग तनी ललचीया किस्म के मणूष होता है, टेस्ट करने के नाम पर जहर को भी फ्री में बाँट दिया जाय तो खुसी खुसी चाट के मर जायेगा।   और यही टेस्ट करने के चकर में यहां के रजवाड़ों ने अपना उंगलि ऊ ससुर अंग्रेज के हाँथ में थमा दिया फिर का है साला यहां के गोलकी चखने के बाद सीधा कपार पर चढ़ के  1858 से 1947 तक तानड़ाव कर दिया, और फिर का है इहाँ के लोग थोड़ा ललचिया जरुर हैं लेकीन मूरख नहीं उल्टी हांथे झोला थमा के इहाँ से विदा कर दिये ऊ ससुर सब तो चल गया लेकिन उकर भी फरज  बनता था की अपने दामाद सब खातिर कुछ छोड़ के जायें, जानतें हैं जी ऊ लोग भी ना गजबे क...

वर्ण व्यवस्था और हिन्दूस्तान

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  किसी ने पुछा है शूद्र पैदा क्यों हो गये, गांधी का हरीजन पैदा कैसे हो गये पैदा होने का कारन है दूनियाँ में वर्ग सदा से है लेकिन वर्ण हिन्दूस्तान की अपनी उपज है अमीर गरीब ये वर्ग हर जगह है लेकिन (स्वर्ण,क्षत्रिये,वश्य और शूद्र) जैसा  वर्ण दुनिया में कहीं नहीं है। वर्ग का मतलब है कोई आदमी गरीब है चाहे तो कल को अमीर भी हो सकत है अमीर आदमी एक समय के बाद गरीब भी हो सकता है, यह एक तरलता है समय के अनुकूल परिवर्तन हो सकता है।  हिन्दूस्तान ने बड़ी चालाकी का कम किया उसने गरीबी और अमीरी के बिच जो तरलता थी उसे खतम कर वर्ण को प्रतिस्थापित कर दिया वर्ण का अर्थ है ठोस हुवा वर्ग, जम गया वर्ग जिसमें बदलाहट नहीँ हो सकती, तू उपर नही जा सकता, ऊपर की Classes को इससे फायदा हुवा क्यों की नीचे की Classes की प्रतियोगिता खतम हो गया। हिन्दूस्तान ने एक तरकीब इजात की प्रतियोगिता खतम करने की करोड़ों शूद्रों से प्रतियोगिता खतम हो गयी अब उनके बेटे ब्राह्मणों से संघर्ष ना का कर सकेंगे ऋषि होने का, व्य्श्यों से संघर्ष ना  कर सकेंगे धनपति होने का अब उनके बेटे बहादूरों की तरह लड़ ना सकेंगे क्षत्रियों ...

मैं इतिहास था, विवादित रहा

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  मैं इतिहास था, विवादित रहा, ओ भूगोल थी, बदलती रही ।। -निल्ल मेहरा | लेख की दूनियाँ 

बुढापा जिवन का सत्य

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  देखीये  हम और हमारी सभ्यता भले हीं  गारो, खासी जयंतीया की पहाड़ियों को नाँघ कर आज 3×10^8  m/s से भी तेज रफ्तार चलने वाली 5 जी के जमाने तक आ पहुंची है, पर इस सफर में जो रास्ते हैं, उन्हें कड़ी बा कड़ी जोड़े   रखने का प्रमाण हमारे पूर्वजों से मिलतीं है। परंतु हमारे लिये दादा जी एक एसे समकालीन पूर्वजों में से एक है, जो हमको अपना इतिहास सभ्यता और संस्कृति के उस अंतिम क्षोर को हमारी हांथो में सौंपते है जो उनके पुर्व था, जिसे हमें भी अपने आने वाले 6G,7G तक के भावी पीढ़ी के हांथो में जिमेदारी पुर्वक सौपना होगा। जिवन चक्र मे इतिहास बदलेंगी, मानव सभ्यता का विकाश होगा परंतु इन सब मे एक निकाय स्देव नियत रहेगी जिसे हम बुढापा कहते हैं, जो अक्सर गालों की झुरियं, सफेद बाल, फटी एड़ी, आँख का धुंधलापन, कमर और घुठनो का दर्द, टुटे दाँत आदी लक्षण से हमे पता चलती है।  जो हमे बताती है कि, आधुनिकता सर्वप्रथम अफगान स्नो पाऊडर से आज के वाईट ट्यून फेस पाऊडर तक की सफर को भले ही तय कर ली है, लेकिन आने  वाले दिनो में तुम्हारे गालों पर भी झुरियं आयेगी, जिस दुरी को तुम आज चसम...